मूत्रोपचार विधि
प्रकाशित: 07-08-2026 | 07:06 AM
<p>मूत्रोपचार विधि if (!isDesktop()) { window.googletag = window.googletag || { cmd: [] }; const ads = [ { adUnit: '/1031084/WD_Mobile_1X1_Test_A', divId: 'div-gpt-ad-1771932867897-0' }, { adUnit: '/1031084/Billboard_1x1', divId: 'div-gpt-ad-1778486636609-0' }, { adUnit: '/1031084/Light_Box_1x1', divId: 'div-gpt-ad-1778486744849-0' }, { adUnit: '/1031084/Native_Test_1x1', divId: 'div-gpt-ad-1778486843934-0' }, { adUnit: '/1031084/Novoroll_InRead_1X1', divId: 'div-gpt-ad-1778486928136-0' }, { adUnit: '/1031084/Affinity_Footer_HI', divId: 'div-gpt-ad-1785151590617-0' }, { adUnit: '/1031084/Affinity_Footer_TG', divId: 'div-gpt-ad-1785151700816-0' }, { adUnit: '/1031084/Affinity_Footer_TM', divId: 'div-gpt-ad-1785151795749-0' }, { adUnit: '/1031084/Affinity_M-Canvas_1x1', divId: 'div-gpt-ad-1785151861757-0' }, { adUnit: '/1031084/English_Webstory', divId: 'div-gpt-ad-1785151937431-0' }, { adUnit: '/1031084/Hindi_Webstory', divId: 'div-gpt-ad-1785151996435-0' }, { adUnit: '/1031084/Infolinks_Footer_II_1X1', divId: 'div-gpt-ad-1785152063641-0' }, { adUnit: '/1031084/Mediastreet_InRead_1X1', divId: 'div-gpt-ad-1785152138790-0' }, { adUnit: '/1031084/Mobile_Global_1_Interstitial_1x1', divId: 'div-gpt-ad-1785152210452-0' }, { adUnit: '/1031084/Mobile_Global_2_Interstitial_1x1', divId: 'div-gpt-ad-1785152281895-0' }, { adUnit: '/1031084/Mobile_Interstitial_1x1', divId: 'div-gpt-ad-1785152356724-0' }, { adUnit: '/1031084/Mobile_Interstitial_GU_1x1', divId: 'div-gpt-ad-1785152429529-0' }, { adUnit: '/1031084/Mobile_Interstitial_HI_1x1', divId: 'div-gpt-ad-1785152510302-0' }, { adUnit: '/1031084/Mobile_Interstitial_KN_1x1', divId: 'div-gpt-ad-1785152595623-0' }, { adUnit: '/1031084/Mobile_Interstitial_MA_1x1', divId: 'ddiv-gpt-ad-1785152723148-0' } ]; const container = document.getElementById('mobile_1x1_ads'); googletag.cmd.push(function () { ads.forEach(function(ad) { var div = document.createElement('div'); div.id = ad.divId; container.appendChild(div); googletag.defineSlot( ad.adUnit, [1, 1], ad.divId ).addService( googletag.pubads().enableSingleRequest(); ads.forEach(function(ad) { googletag.display(ad.divId); }); }); } if (!isDesktop()) { let div = document.createElement("div"); div.id = "div-gpt-ad-1774514635711-0"; div.style.minWidth = "300px"; div.style.minHeight = "250px"; document.getElementById("art_mb_top").appendChild(div); window.googletag = window.googletag || { cmd: [] }; googletag.cmd.push(function () { ).addService( googletag.pubads().enableSingleRequest(); } स्वमूत्र चिकित्सा निम्न छह प्रकार से की जाती है-1. स्वमूत्र से सारे शरीर की मालिश2. स्वमूत्रपान3. केवल स्वमूत्र और पानी के साथ उपवास4. स्वमूत्र की पट्टी रखना5. स्वमूत्र के साथ अन्य प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग6. स्वमूत्र को सूर्य किरण देकर(1) स्वमूत्र से मालिशबड़े फोड़े, चमड़ी की सूजन, चीरे, जख्म, फफोले और आग के घाव आदि को छोड़कर शेष सभी रोगों के उपचार का आरंभ स्वमूत्र मालिश से करना चाहिए। मालिश के लिए 36 घंटे से सात-आठ दिन का पुराना स्वमूत्र ही अत्यधिक फायदेमंद सिद्ध होता है। पुराना होने पर इसमें अमोनिया नामक द्रव्य बढ़ जाता है। अमोनिया के कारण यह मूत्र शरीर के लाखोंलाख छिद्रों में जल्दी से और ज्यादा परिमाण में दाखिल हो जाता है।प्रत्येक व्यक्ति को मालिश के लिए प्रतिदिन करीब आधा सेर स्वमूत्र की आवश्यकता होती है। सात बड़ी शीशियों में सात दिन के पुराने स्वमूत्र का संग्रह क्रम में रखा जाए। शीशियों का मुँह हमेशा बन्द रखा जाए, ताकि उसमें कोई भी जीव-जन्तु मरने न पाए। मानव मूत्र कृमिनाशक है। उसमें कीड़े नहीं पड़ते। शीशियाँ इस क्रम में रखी जाएँ, ताकि जो शीशी खाली हो जाए वह भरती जाए। सर्दी की ऋतु में या मनुष्य की प्रकृति के अनुसार रखा हुआ मूत्र थोड़ा गरम भी किया जा सकता है।पहले रखे हुए स्वमूत्र में से एक पाव मूत्र एक कटोरी में डालकर तलवे से कमर तक मालिश करके सुखा दें और जो गंदा अंश कटोरी में बचे उसे गिरा दें। फिर एक पाव लेकर कमर से सिर तक मालिश करनी चाहिए। मालिश हलके हाथ से करनी चाहिए, ताकि रोगी या मालिश कराने वाले को कष्ट न हो। हाथ ऊपर-नीचे ले जाना चाहिए। मालिश कितनी देर की जाए यह आवश्यकतानुसार तय किया जा सकता है। अगर मालिश के लिए अपना मूत्र पर्याप्त न हो, तो दूसरे स्वस्थ व्यक्ति का (जो उसी प्रकार का आहार लेता हो) मूत्र ले सकते हैं। (function(w, q) { w[q] = w[q] || []; w[q].push(["_mgc.load"]) })(window, "_mgq"); किसी भी रोग में, स्वमूत्र का प्रयोग मालिश से प्रारंभ किया जाए तो पहले सप्ताह में ही फायदा झलकने लगता है। चार-पाँच दिन की मालिश के बाद शरीर की गरमी बाहर आने लगती है और शरीर पर लाल रंग की सफेद मुँह वाली फुंसियाँ निकल आती हैं। कभी-कभी इनमें खुजली बढ़ जाती है। कभी-कभी खुजलाने से बड़े-बड़े फोड़े निकल आते हैं। लेकिन इससे न तो घबराना चाहिए और न ही उसका बाहरी इलाज ही इलाज करना चाहिए। मूत्र मालिश का क्रम जारी रखना चाहिए। जरा जोर से मालिश कर देने पर वे फुंसियाँ फूट जाएँगी और जहाँ उनमें मूत्र दाखिल हुआ वहाँ वे शांत हो जाएँगी। बड़े फोड़े होने पर गरम मूत्र से दो-तीन बार सेंक कर दें।ऐसा इसलिए होता है कि मालिश से शरीर के छिद्रों द्वारा मूत्र जब अन्दर जाता है, तो छोटे-छोटे रोग भागने लगते हैं, जिसकी यह पहली प्रतिक्रिया है। खुलजी, दाद, एक्जिमा आदि तथा शरीर के अन्य सामान्य रोग केवल दस-पन्द्रह दिन की मालिश से दूर होने लगते हैं, किन्तु यदि गंभीर और जीर्ण रोग हों, जिसे सूई लेकर या दवा की पुड़िया खाकर हटाया नहीं जा सका है, उस असाध्य से असाध्य रोग को मिटाने के लिए स्वमूत्र और निर्मल पानी के साथ उपवास करना ही होगा।मालिश करने के दो घंटे बाद गुनगुने या ठंडे जल से स्नान करना चाहिए। किसी प्रकार के साबुन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। मालिश करने के बाद धूप स्नान लिया जा सकता है। मेहनत भी की जा सकती है। स्वमूत्र चिकित्सा में मूत्र मालिश का एक अद्वितीय महत्वपूर्ण स्थान है। उपवास में यदि नियमित मूत्र मालिश न की गई, तो उपवास का सारा असर जाता रहता है और वह निष्फल सिद्ध होता है।परिचय स्वमूत्र चिकित्सा का अर्थ है स्वयं के मूत्र द्वारा विभिन्न बीमारियों का उपचार। इस पद्धति में न तो रोगी की नाड़ी देखने की आवश्यकता है, न एक्स-रे लेने की। न थर्मामीटर लगाना है, न सूई की जरूरत। न दवा और पथ्य का सिरदर्द है और न धन या समय खर्च करने की अनिवार्यता। इसमें स्वमूत्र ही निदानकर्ता, चिकित्सक एवं दवा है। रोगी स्वयं बिना खर्च और बिना किसी परिश्रम के स्वमूत्र सेवन कर रोगमुक्त हो सकता है। स्वमूत्र चिकित्सा के माध्यम से कई असाध्य बीमारियों का उपचार भी संभव है। इतिहासस्वमूत्र चिकित्सा का इतिहास काफी पुराना है। भगवान शंकर के डामरतंत्रान्तर्गत शिवाम्बुकल्प की अमरौली मुद्रा का परिचायक एक श्लोक है जिसमें कहा गया है-शिवाम्बु चामृतं दिव्यं जरारोगविनाशनम्।तदादाय महायोगी कुर्याद्वै निजसाधनम्॥1॥शिवाम्बु दिव्य अमृत है, बुढ़ापे एवं रोग का नाशक है। महायोगी उसका पान करके अपनी साधना करें।इसी प्रकार दूसरा श्लोक है-द्वादशाब्दप्रयोगेण जीवेदाचन्द्रतारकम्।बाध्यते नैव सर्पाद्यैर्विषाद्यैर्न विहिंस्यते॥न दह्येताऽग्निना क्वापि जलं तरति काष्ठवत्।2बारह वर्ष तक शिवाम्बु का सेवन करने वाला चाँद-तारों की तरह दीर्घ अवधि तक जीता है। उसे सर्प आदि विषैले प्राणी पीड़ा नहीं पहुँचाते और न उस पर विष का असर होता है। वह आग से कभी नहीं जलता और पानी पर लकड़ी की तरह तैरने लगता है।उपलब्ध ग्रंथों में प्राप्त उद्धरणों से यह स्पष्ट है कि आदिकालीन जम्बूदीप में मानव-मूत्र की चिकित्सा पद्धति प्रचलित थी और इसके आचार्य भगवान शंकर थे। कालान्तर में अरण्यांचलों में रहने तथा अपने निरन्तर अन्वेषणों के कारण ऋषि-कुल स्वमूत्र चिकित्सा के बजाय प्राकृतिक चिकित्सा की ओर झुका। 'जल, अग्नि, आकाश, मिट्टी और हवा' के विभिन्न प्रयोग कर उसने रोग से मुक्त होने की नई विधि बनाई। उसमें मूत्र चिकित्सा जैसी चमत्कारिता, पवित्रता तथा उपादेयता का अभाव रहा, इसलिए प्रकृति प्रदत्त जड़ी-बूटियों, खनिज पदार्थों आदि के गुणकारी तत्वों में पंचभूतों की खोज की गई, जिससे 'भेषज चिकित्सा' प्रणाली अविर्भूत हुई, जो आज आयुर्वेद के नाम से जानी जाती है।भावप्रकाश में स्वमूत्र की चर्चा करते हुए इसे रसायन, निर्दोष और विषघ्न बताया गया है। डामरतन्त्र में प्राप्त उद्धरणों के अनुसार भगवान शंकर ने माता पार्वती को इसकी महिमा समझाई और कहा कि स्वशरीर के लिए स्वमूत्र अमृत है। इसके प्राशन से मनुष्य निरोग, तेजस्वी, बलिष्ठ, कांतिवान, निरापद तथा दीर्घायु को प्राप्त होता है। अथर्ववेद, हठयोगप्रदीपिका, हारीत, वृद्धवाग्भट्ट, योगरत्नाकर, जैन, बौद्ध, ईसाई आदि धर्मों के अनेक ग्रंथों में स्वमूत्र चिकित्सा की चर्चा है। if (isDesktop()) { let div = document.createElement("div"); div.id = "div-gpt-ad-1656303527422-0"; div.style.minWidth = "336px"; div.style.minHeight = "280px"; document.getElementById("ros_left").appendChild(div); window.googletag = window.googletag || { cmd: [] }; googletag.cmd.push(function () { ).addService( googletag.pubads().enableSingleRequest(); } अघोरपंथी अवधूतों तथा तांत्रिकों की परम्परागत स्वमूत्र प्राशन विधि तथा स्वमूत्र मालिश क्रिया ने स्वमूत्र चिकित्सा को आज तक जीवित रखकर न केवल मानव जाति का उपकार किया है, वरन चिन्तकों के समक्ष यह यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि वे इस चिकित्सा प्रणाली को पुनः प्रतिष्ठित करने की अगुआई करें।सोलहवीं शताब्दी के सूफी कवियों और एशिया तथा यूरोप के कुछ वैज्ञानिकों ने स्वमूत्र चिकित्सा को लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया, मगर उन्हें सफलता नहीं मिली। मगर इतना निर्विवाद है कि आज भी शीत प्रदेश तथा पीत प्रदेश में रहने वाले लोग बड़ी संख्या में हैं, जो स्वमूत्र प्राशन से अपने को निरोग रखते हुए दीर्घ जीवन जीते हैं।तिरुवनंतपुरम स्थित गवर्नमेंट आयुर्वेद कॉलेज द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक आयुर्वेदिक नारियल चटाई से लैस कमरों में रहने से कई बीमारियाँ दूर हो जाती हैं। इस शोध के अंतर्गत शोधकर्ताओं ने लोगों को दो समूहों में बाँटा। कुछ लोगों को आयुर्वेदिक तत्वों से युक्त नारियल रेशों से बनी चटाइयों से फिट कमरों में रखा गया, जबकि कुछ को साधारण कमरों में। कुछ कमरों की आंतरिक दीवारों और फर्श को इन चटाइयों से लैस किया गया, जबकि दूसरे कमरों को इससे वंचित रखा गया। 36 रोगियों पर यह शोध किया गया। 19 रोगियों को आयुर्वेदिक चटाइयों वाले कमरों में रखा गया जबकि शेष को सामान्य कमरों में। इन चटाइयों को कई तरह के आयुर्वेदिक तत्वों के घोल में डालकर सुखाया गया था। यहाँ तक कि बिस्तर और तकियों को भी कुछ खास तरह की जड़ी-बूटियों के घोल में डुबोकर सुखाया गया। फिर उन पर रोगियों को सोने के लिए कहा गया। दोनों तरह के रोगियों को एक ही तरह की दवाई और भोजन दिया गया। जिन रोगियों को आयुर्वेदिक कमरों में रखा गया, उनमें कई सकारात्मक बदलाव देखे गए। आयुर्वेद के एक डॉक्टर एन. विश्वनाथन ने दावा किया कि जो रोगी चर्मरोग से ग्रस्त थे और जिन्हें आयुर्वेदिक कमरों में रखा या था, वे गैर-आयुर्वेदिक कमरों में रहने वाले लोगों की तुलना में काफी कम समय में चंगे हो गए। वे इन आयुर्वेदिक कमरों में दो सप्ताह रहने के बाद स्वस्थ हो गए, जबकि सामान्य आहार और दवा लेने वाले दूसरे रोगियों को और 26 दिनों तक स्वस्थ होने के लिए इंतजार करना पड़ा। उनके मुताबिक गठिया, उच्च रक्तचाप आदि जैसी बीमारियों से ग्रस्त लोगों पर यह आयुर्वेदिक तकनीकी अधिक असर दिखाती है। googletag.cmd.push(function() { .blogImgBlock img {max-width: 100%;} .authorimageside img { width: 70px; height: 70px; border-radius:50%;} हमारे साथ WhatsApp पर जुड़ने के लिए यहां</p>