इटावा के बकेवर कस्बे और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित पौराणिक कुएं आज उपेक्षा, अतिक्रमण और रखरखाव के अभाव के कारण अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। कभी पेयजल, धार्मिक आस्था और जल संरक्षण के प्रमुख केंद्र रहे ये ऐतिहासिक जलस्रोत अब गंदगी और अवैध कब्जों की चपेट में हैं।
अतिक्रमण और गंदगी से बिगड़ रही हालत
कस्बे में मौजूद आधा दर्जन से अधिक प्राचीन कुएं वर्षों से उपेक्षा का शिकार हैं। कई कुएं मलबे में दब चुके हैं, जबकि कुछ पर अवैध कब्जा कर लिया गया है। कई स्थानों पर झाड़ियां उग आई हैं और कुछ कुओं को कूड़ा फेंकने का स्थान बना दिया गया है, जिससे उनकी ऐतिहासिक पहचान धीरे-धीरे मिटती जा रही है।
कभी पेयजल और आस्था का प्रमुख केंद्र थे कुएं
औरैया रोड स्थित परमहंस मंदिर के सामने, गांधी नगर समेत कई स्थानों पर बने ये प्राचीन कुएं कभी क्षेत्रवासियों के लिए पेयजल का मुख्य स्रोत हुआ करते थे। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार इनका निर्माण जनकल्याण की भावना से कराया गया था। धार्मिक अनुष्ठानों, विवाह संस्कारों और पर्व-त्योहारों में भी इन कुओं का विशेष महत्व रहा है।
भूजल संरक्षण में निभा सकते हैं अहम भूमिका
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन प्राचीन जलस्रोतों का वैज्ञानिक तरीके से पुनर्जीवन और संरक्षण किया जाए, तो इससे भूजल स्तर में सुधार होगा और वर्षा जल संचयन को भी बढ़ावा मिलेगा। यह पर्यावरण संरक्षण और जल संकट से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से की कार्रवाई की मांग
स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से क्षेत्र के सभी प्राचीन कुओं का सर्वे कराने, अतिक्रमण हटाने, साफ-सफाई, सौंदर्यीकरण और संरक्षण की ठोस योजना तैयार करने की मांग की है। लोगों का कहना है कि इन ऐतिहासिक जल धरोहरों को संरक्षित कर न केवल क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत बचाई जा सकती है, बल्कि जल संरक्षण की पुरानी परंपरा को भी फिर से जीवंत किया जा सकता है।