इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक की ऋण वसूली प्रक्रिया को लेकर अहम आदेश जारी किया है। कोर्ट ने कहा है कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट आने तक बैंक किसी भी किसान से मूल ऋण राशि के दोगुने से अधिक रकम की वसूली नहीं करेगा। साथ ही, यदि कोई किसान बकाया राशि किस्तों में चुकाने का अनुरोध करता है तो बैंक को उस पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करना होगा।
15 मामलों की सुनवाई के बाद आया आदेश
यह आदेश न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने बैजनाथ बनाम उत्तर प्रदेश सरकार सहित 15 संबंधित मामलों की सुनवाई के बाद 22 जुलाई 2026 को पारित किया। मामला तब चर्चा में आया जब महोबा के एक किसान द्वारा दो भैंस खरीदने के लिए लिया गया ₹50,000 का कृषि ऋण बढ़कर ₹3.49 लाख हो गया। बकाया राशि नहीं चुकाने पर किसान की 0.882 हेक्टेयर जमीन की नीलामी की प्रक्रिया शुरू हुई, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
ऋण वसूली प्रक्रिया पर कोर्ट ने जताई चिंता
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सहकारी बैंक की ऋण वसूली प्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि बैंक किसानों से औसतन 14 प्रतिशत तक ब्याज वसूल रहा है, जबकि राष्ट्रीयकृत बैंकों में किसान क्रेडिट कार्ड और कृषि ऋण पर प्रभावी ब्याज दर इससे काफी कम है।
डिफॉल्टर किसानों के आंकड़ों पर भी चिंता
कोर्ट के समक्ष पेश आंकड़ों के अनुसार, सहकारी ग्राम विकास बैंक के 2,74,166 कर्जदार डिफॉल्टर हैं। इन पर मूलधन करीब ₹1,567.87 करोड़ है, जबकि ब्याज सहित कुल बकाया राशि बढ़कर ₹7,061.22 करोड़ तक पहुंच गई है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि कई पुराने मामलों में ब्याज की राशि मूलधन से कई गुना अधिक हो चुकी है।
विशेषज्ञ समिति करेगी व्यापक समीक्षा
हाईकोर्ट ने सहकारी बैंकिंग व्यवस्था में सुधार के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया है। समिति शासन व्यवस्था, वित्तीय प्रबंधन, डिजिटल सिस्टम, ब्याज दर, ऋण वसूली प्रक्रिया, भूमि अभिलेख और संस्थागत जवाबदेही जैसे विषयों की समीक्षा करेगी। कोर्ट ने मुख्य सचिव को समिति का गठन कर आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने का निर्देश दिया है।
8 सितंबर को होगी अगली सुनवाई
मामले में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से अनुपालन रिपोर्ट तलब की है। इस मामले की अगली सुनवाई 8 सितंबर 2026 को निर्धारित की गई है।