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रायबरेली ग्राउंड रिपोर्ट: मिड डे मील की हकीकत, बच्चों की थाली से लेकर रसोइयों के दर्द तक

प्रकाशित: 25-07-2026, 10:36 AM
रायबरेली ग्राउंड रिपोर्ट: मिड डे मील की हकीकत, बच्चों की थाली से लेकर रसोइयों के दर्द तक
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रायबरेली के कम्पोजिट विद्यालय सिरसा, ग्राम सभा चकसुंडा में प्रधानमंत्री पोषण योजना (मिड डे मील) की जमीनी हकीकत जानने के लिए महुआ टीवी की टीम ग्राउंड जीरो पर पहुंची। जांच के दौरान योजना की दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आईं। एक ओर स्कूल प्रशासन व्यवस्था को बेहतर बता रहा है, जबकि दूसरी ओर रसोइयां कम मानदेय और भुगतान में देरी को लेकर नाराज नजर आईं।

रसोइयों का दर्द: "2000 रुपये में घर कैसे चले?"

पिछले पांच वर्षों से स्कूल में खाना बना रही एक रसोइया ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि उन्हें हर महीने केवल ₹2000 मानदेय मिलता है, वह भी अक्सर दो से तीन महीने की देरी से। रसोइया ने कहा, "मिले या न मिले, काम तो रोज करना पड़ता है। गैस, मसाले और सब्जियां सब महंगी हो गई हैं। ₹2000 में घर कैसे चले?" उन्होंने आरोप लगाया कि कई बार त्योहारों और छुट्टियों में भी बुला लिया जाता है, लेकिन उसके लिए कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं किया जाता। रसोइयों की मांग है कि उनका मानदेय बढ़ाकर कम से कम ₹5000 प्रति माह किया जाए और भुगतान समय पर मिले।

कैमरे पर चुप, लेकिन दबी आवाज में लगाए आरोप

स्कूल में कार्यरत कुछ अन्य रसोइयों ने कैमरे के सामने बोलने से इनकार किया, लेकिन ऑफ रिकॉर्ड बातचीत में उन्होंने स्कूल की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए और मनमानी होने के आरोप लगाए। हालांकि, उन्होंने खुलकर कुछ भी कहने से परहेज किया।

प्रधानाध्यापक का दावा: "बच्चों की थाली में कोई समझौता नहीं"

विद्यालय की प्रधानाध्यापक रोज़ी अहमद ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि स्कूल में मिड डे मील योजना पूरी तरह निर्धारित मानकों के अनुसार संचालित की जा रही है। उन्होंने बताया कि बच्चों को रोजाना रोटी, चावल, दाल और सब्जी दी जाती है। सप्ताह में दो दिन फल और दूध भी उपलब्ध कराया जाता है। मेन्यू चार्ट स्कूल की दीवार पर लगाया गया है और भोजन की गुणवत्ता व साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है। प्रधानाध्यापक ने यह भी कहा कि सरकार की ओर से दो ड्रेस के लिए ₹1200 प्रति वर्ष सीधे बच्चों के अभिभावकों के खाते में भेजे जाते हैं। उन्होंने बताया, "चावल कोटे से आता है। सब्जियां कभी-कभी बच्चे लेकर आते हैं, तो कई बार हम स्वयं बाजार से खरीदते हैं।"

शिक्षक बोले: "रसोइयों का मानदेय बढ़ना चाहिए"

स्कूल के एक शिक्षक ने माना कि रसोइयों का मानदेय बेहद कम है। उन्होंने कहा, "हमारी सैलरी समय पर आ जाती है, लेकिन रसोइयों का मानदेय सरकार से आता है। हम भी चाहते हैं कि उनका मानदेय बढ़े क्योंकि वही मेहनत करके बच्चों के लिए खाना बनाती हैं। बच्चों की थाली की गुणवत्ता और साफ-सफाई पर हम खुद नजर रखते हैं।"

बच्चों ने सुनाई कविता, पढ़ाई पर दिखा सकारात्मक माहौल

महुआ टीवी की टीम से बातचीत के दौरान छोटे बच्चों ने अपना परिचय दिया और कविता भी सुनाई। इससे स्कूल में पढ़ाई का माहौल सकारात्मक दिखाई दिया। हालांकि भोजन को लेकर अधिकांश बच्चे कैमरे पर ज्यादा खुलकर नहीं बोले। कुछ बच्चों ने इतना जरूर कहा कि उन्हें खाना अच्छा मिलता है। बच्चों के मुताबिक, "कभी खीर मिलती है, कभी आलू-सोयाबीन की सब्जी। खाना अच्छा होता है और भूख नहीं लगती।" यह कहना मुश्किल है कि बच्चों की यह प्रतिक्रिया पूरी तरह वास्तविक अनुभव पर आधारित थी या कैमरे के सामने बोलने की झिझक भी इसकी वजह रही।

स्कूल में कितने बच्चे उठा रहे हैं योजना का लाभ?

विद्यालय में कुल 110 बच्चे पंजीकृत हैं, जबकि प्रतिदिन लगभग 90 से 100 बच्चे मिड डे मील का लाभ उठाते हैं।

ग्राउंड रिपोर्ट का निष्कर्ष

महुआ टीवी की इस ग्राउंड रिपोर्ट में मिड डे मील योजना की दो तस्वीरें सामने आईं। एक तरफ स्कूल प्रशासन का दावा है कि बच्चों को तय मेन्यू के अनुसार गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ रसोइयां कम मानदेय, भुगतान में देरी और कार्य परिस्थितियों को लेकर नाराज हैं। कई रसोइयों ने स्कूल की व्यवस्थाओं पर सवाल जरूर उठाए, लेकिन कैमरे के सामने खुलकर बोलने से बचीं। ऐसे में यह साफ है कि योजना के संचालन को लेकर कुछ सवाल अब भी बने हुए हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच और समाधान की आवश्यकता महसूस होती है।

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