पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने 7 अगस्त 2026 को मक्का में जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए थे। इस एग्रीमेंट के अंतर्गत ये बोला गया है कि अगर तीनों में से किसी एक देश पर भी हमला किया जाएगा, तो उसे सभी देशों पर हमले के रूप में देखा जाएगा। समझौते में करीब 3 लाख सैनिकों की फोर्स बनाई जाएगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान इस जॉइंट फोर्स में करीब 1 लाख सैनिकों का योगदान करेगा, जिसके कारण ये मुद्दा चर्चा में आ रहा है। इस संख्या में करीब 50 हजार सैनिक लड़ाकू अभियानों में और 50 हजार सैनिक ट्रेनिंग एवं सैन्य सहयोग के लिए बताए जा रहे हैं। हालांकि, पाकिस्तान, सऊदी अरब या तुर्की ने अभी तक 3 लाख सैनिकों वाली सेना या उनके आंकड़ों की आधिकारिक घोषणा नहीं की है।
पाकिस्तान की इसमें क्या है भागीदारी?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान ने भी सेना में अधिकारीयों की तैनाती का जिक्र किया है। उनमें से एक लेफ्टिनेंट जनरल, 2 से 3 मेजर जनरल, 7 ब्रिगेडियर और करीब 200 वरिष्ठ सैन्य अधिकारी शामिल हैं। पहले से ही पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ रक्षा और मिलिट्री ट्रेनिंग के क्षेत्र में सहयोग करता आ रहा है। मक्का समझौते के अंतर्गत तीनों देश रक्षा सहयोग के कई क्षेत्रों में एक-दूसरे का साथ देने के लिए सहमत हुए हैं। पाकिस्तान ने ये भी साफ कर दिया है कि ये समझौता सिर्फ सुरक्षा के मूल से किया गया है और किसी एक देश के खिलाफ निर्देशित नहीं है।
तुर्की और सऊदी अरब कैसे जुड़े?
प्रस्तावित 3 लाख सैनिकों की संख्या में से 1 लाख अधिकारी पाकिस्तान पेश करेगा और बाकी योगदान सऊदी अरब और तुर्की करेगा, ये अनुमान लगाया जा रहा है। लेकिन किसी देश ने भी इस बात की आधिकारिक तौर से पुष्टि नहीं की है। सूत्रों के मुताबिक, तुर्की अपने बेहतर डिफेंस सिस्टम और मजबूत डिफेंस इंडस्ट्री के साथ अहम भूमिका निभा सकता है। वहीं, सऊदी अरब अपनी बेहतरीन आर्थिक और मिलिट्री पावर के साथ समझौते में शामिल हो रहा है। वहीं, पाकिस्तान अपने परमाणु हथियारों के साथ शामिल हुआ, जिसने इनके इस सुरक्षा ढांचे की रणनीतिक रूप से अहमियत बढ़ा दी है। इसी वजह से फिलहाल इसे तीन देशों का डिफेन्स फ्रेमवर्क कहना ज्यादा सही होगा, न कि किसी बड़े पैन-इस्लामिक मिलिट्री अलायंस के रूप में देखना।
इस्लामिक नाटो का टाइटल क्यों दिया गया?
कलेक्टिव सिक्योरिटी सिस्टम के चलते कुछ विश्लेषक इस समझौते को ‘इस्लामिक NATO’ का नाम दे रहे हैं। पाकिस्तान की तरफ से बयान आया है कि ये गठबंधन किसी देश की तरफ निर्देशित नहीं है, बल्कि देशों में शांति बरकरार रखने के लिए सुरक्षा और कलेक्टिव सिक्योरिटी के तौर पर लिया गया फैसला है। ये भी कहा गया है कि ये समझौता भविष्य में बाकी आस-पास के देशों के लिए खुला रहेगा। इजीप्ट का नाम भविष्य में एक सदस्य के तौर पर सामने आ रहा है और तो और कतर, जॉर्डन, अजरबैजान और सीरिया जैसे देशों को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही हैं। यहां तक कि तीनों देशों ने 31 अगस्त को इस्तांबुल में स्ट्रेटेजिक पोलिटिकल एंड डिफेन्स समिति की एक बैठक की, जिसके बाद सऊदी अरब में एक सेक्रेटेरिएट स्थापित करने का फैसला भी लिया गया है। इससे ये बात तो साफ हो जाती है कि मक्का डिफेंस पैक्ट अब केवल एक घोषणा नहीं, बल्कि एक इंस्टीट्यूशनल डिफेंस कोऑपरेशन बनकर आगे बढ़ रही है। फिलहाल 3 लाख सैनिकों की फोर्स और पाकिस्तान के 1 लाख सैनिक देने की खबर की सिर्फ अटकलें बताई जा रही हैं। अब इंतजार है तो सिर्फ आधिरिक घोषणा का।