(By- Anshuman Tripathi) केंद्र सरकार 2029 में एक देश-एक चुनाव को अमल में लाने की कवायद में जुट गई है। सोमवार को इसी सिलसिले में संयुक्त संसदीय समिति की एक अहम बैठक बुलाई गई। जेपीसी के अध्यक्ष पीपी चौधरी की मौजूदगी में हुई इस बैठक में कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी, पूर्व गृहमंत्री और कांग्रेस सांसद पी चिदंबरम के अलावा टीएमसी की एमपी सागरिका घोष, एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले भी शामिल हुईं। पीपी चौधरी ने बताया कि इससे जुड़े सभी हितधारक एक देश-एक चुनाव के पक्ष में हैं। उनका कहना है कि अगर राज्यों का समर्थन मिले तो इस पर अमल किया जा सकता है। जेपीसी की बैठक संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 पर विचार के लिए बुलाई गई थी। दिसंबर, 2024 में लोकसभा में पेश किए गए यह विधेयक जेपीसी के पास विचार के लिए भेज दिए गए थे।
बिल के विरोध में हैं कांग्रेस और टीएमसी
कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने इन विधेयकों का पुरजोर विरोध किया। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस की तरफ से पी चिदंबरम ने इन विधेयकों को असंवैधानिक बताया। उका कहना था कि उनका विवेक इस प्रस्ताव को स्वीकार करने की इजाजत नहीं देता। उनकी दलील थी किसी भी विधानमंडल का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है, उसके कार्यकाल को कम करना संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन है। उनका यह भी कहना था कि इन विधेयकों को पारित कराने के लिए केंद्र के पास ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत भी नहीं है। चिदंबरम ने एक अहम सवाल उठाया कि अगर राज्य और लोकसभा के चुनाव साथ कराने पर केंद्र में अगर किसी एक पार्टी को बहुमत न मिलने पर क्या स्थिति होगी। कांग्रेस की यह भी दलील थी कि चुनावी खर्च कम करने के लिए एक देश-एक चुनाव का तर्क सही नहीं है। एक साथ चुनाव कराने पर भी वही व्यय होगा, जो अलग-अलग चुनाव कराने पर सरकार का व्यय होता है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल और उनके उम्मीदवार जो असीमित खर्च करते हैं, उसका समाधान निकालने की ज़रूरत है। वहीं टीएमसी सांसद सागरिका घोष का मानना था कि इन विधेयकों से निर्वाचन आयोग को असीमित अधिकार मिल जाएंगे। इस बैठक में पद्म पुरुस्कार सम्मानित दस गणमान्य व्यक्तियों को भी शामिल किया गया था, जिनमें से चार व्यक्तियों ने एक देश-एक चुनाव का समर्थन किया। विरोध कर रहे लोगों का कहना था कि इससे देश में अराजकता की स्थिति पैदा हो जाएगी।
पूर्व राष्ट्रपति कोविंद समिति की रिपोर्ट
इन विधयकों को एक देश-एक चुनाव की संभावना तलाशने के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनाई गई समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया था। यह समिति 2 सिंतबर, 2023 को गठित की गई थी। 191 दिनों के बाद पैनल ने 14 मार्च, 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी थी। समिति ने चरणबद्ध तरीके से लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराए जाने की सिफारिश की थी। इस समिति में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी सम्मिलित थे।
पहले भी हो चुके हैं एक साथ चुनाव
संविधान लागू होन के बाद 1951 से 1967 तक यानी 16 साल तक 1957, 1962 और 1967 तक चार चुनाव एक साथ हुए थे, लेकिन 1970 में चौथी लोकसभा समय से पहल भंग कर दी गई थी। क्योंकि 1969 में कांग्रेस में विभाजन के कारण इदिरा गांधी की सरकार अल्पमत में आ गई थी। फिर कुछ राज्यों की विधानसभा भंग होने के कारण एक साथ चुनाव कराने का सिलसिला टूट गया।
एक देश-एक चुनाव की राह में अड़चनें
सबसे पहली अड़चन दो तिहाई बहुमत को लेकर है, जो केंद्र सरकार के पास नहीं है। अगर किसी तरीके से बहुमत जुटा भी लिया जाए तो सभी राज्यों की सहमति भी ज़रूरी है। जाहिर है कि विपक्ष शासित राज्य इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं। साथ ही उन राज्यों में भी असमंजस की स्थिति है, जहां सरकार का कार्यकाल अभी बाकी है। सरकार के पास विकल्प यही है कि 7 राज्यों में जहां 2027 में चुनाव हो रहे हैं, वहां फिलहाल चुनाव करवा लिए जाएं और 2029 में विधानसभा भंग कर आम चुनाव के साथ दोबारा चुनाव कराए जाएं। इसी तरह 2028 में जिन 8 राज्यों में चुनाव होने हैं, वहां या तो राष्ट्रपति शासन लागू करना होगा या फिर उनका कार्यकाल 2029 तक बढ़ाना होगा। ऐसे में आम राय कायम करना आसान नहीं नज़र आ रहा है। यहां तक कि 2024 में ये विधेयक जब लोकसभा में पेश किया गया तब तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने पुरजोर विरोध किया था।
सरकार की कवायद का राज
केंद्र सरकार को एक देश-एक चुनाव विधेयकों और परिसीमन के लिए महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पारित करवाने के लिए दो तिहाई बहुमत की ज़रूरत है। समझा जा रहा है कि सरकार इसके लिए विपक्षी दलों को रजामंद करने में जुटी हुई है और इन्हें इसी मानसून सत्र में पारित कराने के लिए पूरी ताकत लगा रही है। यही वजह है कि सरकार ने अनिश्चित काल तक के लिए स्थगित की गई संसद के मानसून सत्र का अवसान नहीं किया है क्योंकि सरकार को बहुमत जुटाने की पूरी उम्मीद है। ऐसे में किसी भी समय मानसून सत्र के तहत दोबारा बैठक बुलाई जा सकती है।